Monday, November 26, 2018

بينها الموقف من قضية خاشقجي.. بكري يتحدث عن 5 دلالات بشأن استقبال السيسي لمحمد بن سلمان

دبي، الإمارات العربية المتحدة ( )-- علَّق عضو مجلس النواب المصري، مصطفى بكري، على زيارة ولي العهد السعودي، الأمير محمد بن سلمان، إلى مصر، واستقبال رئيس البلاد عبدالفتاح السيسي له، متحدثا عن 5 دلالات جراء تلك الخطوة من بينها موقف القاهرة من قضية مقتل الصحفي السعودي جمال خاشقجي.
وفي سلسلة تغريدات عبر حسابه على موقع "تويتر"، قال بكري إن "استقبال الرئيس عبدالفتاح السيسي لولي العهد السعودي الأمير محمد بن سلمان في المطار هو أبلغ تعبير عن موقف مصر من المملكة وقيادتها، هذا ليس بموقف جديد ولكن في هذه اللحظات يحمل أكثر من دلالة".
وتابع بكري في حديثه عن الاستقبال والدلالات بقوله: "أولا يمثل ردا مباشرا علي حملة الإدعاءات والأكاذيب التي طالت الأمير محمد من قبل بعض الجهات السياسية والإعلامية، التي تناصب المملكة العداء، وهو ثانيا يعني أن موقف مصر الثابت والمبدئي الذي أعلنه الرئيس السيسي من الاتهامات المتعلقه بقضية مقتل خاشقجي ومحاولة تسييس القضية لا يزال ساريا، وهو ما أعلنه الرئيس السيسي في وقت سابق"واستكمل: "ثالثا يعني ردا مباشرا علي الحملات الإعلامية والسياسية، التي استهدفت جولة ولي العهد والتحريض ضدها لدي دوائر المجتمع المدني وشعوب هذه البلدان".
وكانت الدلالة الرابعة من وجهة نظره هي أنها "رسالة دعم مباشر من مصر في مواجهة التحركات المشبوهة التي تسعي إلى تدويل قضية خاشقجي في محاولة للنيل من المملكة وولي العهد، مما يمثل اعتداء علي سيادة الدوله وحقها في محاكمة مواطنيها، ويمثل اعتداء أيضا علي القانون الدولي الذي لا يعطي الحق للمجتمع الدولي بإتخاذ هذه الإجراءات؛ طالما أن الدولة اتخذت الإجراءات القانونية وبدأت التحقيقات الجادة في هذه القضية"واختتم حديثه بالدلالة الخامسة بقوله: "هي خامسا تأكيد على أن العلاقة المصرية- السعودية تبقة دوما نموذجا لما يجب أن تكون عليه العلاقات العربية - العربية في السراء والضراء"، حسب تعبيره.
ووصل الأمير محمد بن سلمان إلى القاهرة، مساء الاثنين، في ثالث محطات جولته العربية التي شملت دولة الإمارات العربية المتحدة ثم مملكة البحرينوقال مصدران بالكونغرس، لـCNN، إنه من المتوقع عقد جلسة استماع لوزيري الخارجية والدفاع الأمريكيين بشان السعودية أمام جميع أعضاء مجلس الشيوخ، الأربعاء، وأضاف المصدران أن الموضوع الرئيسي هو اليمن ولكن من المتوقع أيضا مناقشة قضية مقتل الإعلامي السعودي جمال خاشقجي وقضايا أخرى خلال الجلسة.
وكان السيناتور كوركر رئيس لجنة العلاقات الخارجية بمجلس الشيوخ قال، في تصريحات لـCNN، إن وزير الخارجية والدفاع ومديرة وكالة الاستخبارات المركزية الأمريكية (CIA)، يجب أن يطلعوا مجلس الشيوخ على الوضع في اليمن والظروف المحيطة بمقتل خاشقجي، قبل أن يقرر المجلس ما سيتخذه من إجراءات تجاه السعودية.
من جانبه، قال السناتور غراهام، في مقابلة مع CNN: "لا تعتقدوا أن الكونغرس سوف يغض الطرف إذا كان ولي العهد السعودي الأمير محمد بن سلمان يجعل العالم مكانا أكثر خطورة، لن نعطي زعيما أوتوقراطيا تذكرة مرور". وأضاف: "لا نريد إعطاء الآخرين الضوء الأخضر ليسلكوا هذا الطريق".
وكان الرئيس الأمريكي دونالد ترامب قال، في بيانه الذي جاء بعنوان "أمريكا أولا" عن مقتل خاشقجي، إن "وكالاتنا الاستخباراتية تواصل تقييم جميع المعلومات، لكن من المحتمل جدا أن يكون ولي العهد على علم بهذا الحدث المأساوي، ربما كان وربما لم يكن!". وذكر ترامب في تصريحات لاحقة أن الاستخبارات لم تتوصل إلى نتيجة حاسمة بشأن دور ولي العهد.
وجاء نفي ترامب لتوصل الاستخبارات الأمريكية إلى نتيجة حاسمة، بعد تقارير إعلامية نقلت عن مصادر أن وكالة الاستخبارات المركزية الأمريكية خلصت إلى أن عملية خاشقجي "لم تكن لتحدث دون علم" ولي العهد السعودي.
بينما وصف عضو مجلس النواب الأمريكي آدم شيف، الذي من المتوقع أن يرأس لجنة الاستخبارات بالمجلس، الرئيس ترامب بأنه "غير أمين". وقال شيف، في مقابلة مع CNN، إنه جرى اطلاعه من قبل وكالة الاستخبارات المركزية الأمريكية، مضيفا: "رغم أنه لا يمكنني مناقشة المعلومات التي جرى اطلاعي عليها بأي حال من الأحوال، ولكن أستطيع القول إن الرئيس غير أمين مع الشعب الأمريكي

Thursday, November 8, 2018

مع احتدام معارك الحديدة، الأمم المتحدة تضاعف مساعداتها الغذائية في اليمن

علن برنامج الأغذية العالمي عن خطط لمضاعفة المساعدات الغذائية إلى اليمن لتصل إلى 14 مليون شخص شهريا، أي ما يقرب من نصف السكان، وذلك مع احتدام المعارك حول مدينة الحديدة.
وقال البرنامج، التابع للأمم المتحدة، إن الوضع في اليمن، الذي يشهد أسوأ أزمة إنسانية في العالم، يتفاقم يوما بعد آخر، مؤكدا الحاجة إلى مزيد من الأموال لتوفير الغذاء.
ويقدم برنامج الأغذية العالمي مساعدات غذائية لنحو سبعة إلى ثمانية ملايين شخص يوميا في اليمن، "لكن الوضع الآن أصبح أكثر إلحاحا إلى الدرجة التي دفعت البرنامج إلى الاستعداد لزيادة المساعدات"، حسبما قال المتحدث باسم البرنامج، هيرفيه فيرهوسل، للصحفيين في جنيف.
واحتدمت المعارك بين القوات الحكومية، التي يدعمها تحالف عسكري تقوده السعودية، والحوثيين المدعومين من إيران بالقرب من ميناء الحديدة.
ويوم الأربعاء، دعت نحو 35 منظمة غير حكومية يمنية ودولية إلى وقف فوري للأعمال العدائية، وقالوا إن 14 مليون شخص في اليمن "على شفا المجاعة".
وقال هيرفيه فيرهوسل: "المؤشرات تظهر أنه ستكون هناك حاجة إلى مزيد من الجهود لمنع وقوع مجاعة شاملة. الرقم الجديد المستهدف، وهو 14 مليون شخص، يتطلب قدرا كبيرا من العمل اللوجيستي، ومراكز التوعية والتمويل والاستعداد".
ودعا البرنامج إلى وقف فوري لأعمال العنف لمنح اليمن "فرصة للابتعاد على حافة" المجاعة.
وحذر من أن اليمن قد "يصبح بلدا من أشباح حية"، قائلا إن "المنظمات الإنسانية لا يمكنها القيام بالكثير من العمل في ظل القصف الذي لا يتوقف وتكتيكات الحرب المروعة التي لا تترك أحدا".
وتقول اللجنة الدولية للصليب الأحمر إنها تقدم مساعدات غذائية وطبية إلى السكان الفارين من المعارك في الحديدة، لكنها شددت على أن أولئك الذين علقوا هناك في يعيشون "كابوسا حيا".
ويسعى التحالف الذي تقوده السعودية إلى استعادة السيطرة على الحديدة، التي تعد مدخلا للمساعدات، وشريان حياة لملايين اليمنيين، بعد أكثر من 3 سنوات من الحرب.
ويسيطر الحوثيون على الحديدة منذ عام 2014 حين استولوا على العاصمة صنعاء وأجزاء كبيرة من اليمن.

Friday, August 31, 2018

को नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का फ़ाइनल ड्राफ़्ट जारी हुआ है

जुलाई, 2018 को नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का फ़ाइनल ड्राफ़्ट जारी हुआ है.
असम के 40 लाख लोगों के नाम इस लिस्ट में शामिल नहीं हैं, इनमें हिंदू-मुसलमान, बंगाली-बिहारी सभी हैं.
अजित दास के मामले की वजह है उनके माता-पिता का 1960 के दशक में बांग्लादेश से भारत आकर बस जाना.
वैसे, उनकी तरह आए तमाम लोगों के पास अगर नागरिकता के प्रमाण हैं तो उनका नाम एनआरसी में या तो आ चुका है या आगे लिस्ट में आने की संभावना है.
हालांकि अजित दास का कहना है कि उनका जन्म वगैरह भारत में हुआ है और सभी प्रमाण मौजूद हैं, लेकिन पिछली बार सभी दस्तावेज़ नामंज़ूर भी कर दिए गए थे.
ज़ाहिर है, जिन लाखों लोगों के नाम एनआरसी में नहीं आए हैं उनके भीतर इस बात को लेकर डर ज़रूर है कि आगे क्या होगा.
सरकार ने इस बात का भरोसा दिलाया है कि किसी के ख़िलाफ़ फ़िलहाल कोई क़दम नहीं उठाया जाएगा.
सभी को सितंबर के अंत तक दोबारा दस्तावेज़ जमा करने का मौक़ा भी दिया गया है.
जिन दस्तावेज़ों को जमा करना है, उनमें से किसी एक से ये प्रमाणित होना ज़रूरी है कि जमा करने वाले या उनके पूर्वजों का नाम 1951 के एनआरसी में या 24 मार्च 1971 तक के किसी वोटर लिस्ट में मौजूद था.
इस बीच असम के इस छोटे से गांव में जुतिका और अजित दास के बच्चे इन दिनों इस बात से ही खुश हैं कि पापा घर वापस लौट आए हैं.
जुतिका के मुताबिक़, "महीनों पिता को न देखने की वजह से बच्चे अब उन्हें घर से सटी हुई दुकान तक में नहीं जाने देते. ये सोच के मन डर भी जाता है कि लाखों ऐसे परिवार असम में मौजूद हैं जिनके ऊपर इस तरह की तलवार लटक रही है. बस एक ही ख़ुशी है कि पति ज़मानत पर क़ैद से छूट गए."
ये ख़ुशी कब तक की है, इसका पता किसी को नहीं.
पिछले साल 10 जुलाई को अनुभूति शांडिल्य 'तीस्ता' ने अपने फ़ेसबुक पेज पर सावन को समर्पित ये लाइनें लिखी थीं. कमेंट बॉक्स में संजय कुमार पांडेय नाम के एक शख़्स के पूछने पर कि इस गीत का ऑडियो वर्जन कब आएगा, तीस्ता ने जवाब दिया था कि जल्दी ही निकलने वाला है.
अब तो इस साल का सावन भी बीत गया, लेकिन इस गीत का ऑडियो कहां है? पता कैसे चलेगा? फ़ेसबुक स्क्रॉल करते-करते नज़र तीस्ता के भाई उद्भव शांडिल्य की एक पोस्ट पर गई. इस साल के सावन के बीत जाने के अगले दिन यानी 27 अगस्त को उद्भव फ़ेसबुक पर लिखते हैं-
"लौट आओ मेरी अपराजिता"
भैया तुमसे साहित्य पढ़ने आया है और तुम्हारे लिए ब्रिटैनिया का केक भी लाया है.
27 अगस्त की शाम उद्भव शांडिल्य पटना एम्स में भर्ती अपनी बहन तीस्ता को देखने गए थे. तब तक डॉक्टरों ने कह दिया था शरीर के सारे ऑर्गन फेल हो चुके हैं. केस अब हाथ के बाहर है. फिर भी भाई उद्भव को न जाने क्यों लग रहा था कि बहन जिसको वह "अपराजिता" कहा करता था, लौट कर आएगी.
पिता उदय नारायण सिंह ने फ़ेसबुक पर 28 अगस्त की शाम एक पोस्ट लिखी था. उन्होंने लिखा कि "तीस्ता ना रहली (तीस्ता नहीं रही)".
उनके इतना कहने के बाद से ही सोशल मीडिया पर लोग तीस्ता को श्रद्धांजलि देने लगे हैं. बिहार और भोजपुर के कला जगत से जुड़े लोग तीस्ता के जाने को लोकागाथा गायन की संस्कृति के लिए एक अपूरणीय क्षति बता रहे हैं.
तीस्ता का असल नाम अनुभूति शांडिल्य है. उम्र महज 17 साल. इसी साल बिहार बोर्ड से 12वीं की परीक्षा पास की थीं. फ़ेसबुक से जो कुछ पता चल पाया उसके अनुसार "तीस्ता" लोकगाथा गायन की पारंपरिक व्यास शैली का पालन करते हुए कुंवर सिंह की वीरगाथा गाती थीं.
देवेंद्र आगे कहते हैं, "ऐसा लग ही नहीं रहा था कि वो उसकी पहली प्रस्तुति थी. मुझे याद है कि वहां मौजूद कला समीक्षक डॉ धीरेंद्र मिश्रा ने मंच से यह कहा था कि अनुभूति के रूप में भोजपुरी को "तीजनबाई" मिली है. क्योंकि वह न सिर्फ़ अपनी खनकती आवाज़ में गा रही थी, बल्कि भावमय नृत्य से सीधे श्रोताओं और दर्शकों के दिलों में उतर भी रही थी.''
बिहार में छपरा ज़िले के रिविलगंज की रहने वाली तीस्ता के पिता उदय नारायण सिंह ख़ुद भी संगीत के शिक्षक हैं. कई कार्यक्रमों में आयोजित तीस्ता की प्रस्तुतियों में मंच पर वो भी अपनी बेटी के साथ नज़र आते थे.
महज 13 साल की उम्र में तीस्ता ने पहली बार मैथिली-भोजपुरी अकादमी की तरफ़ से आयोजित एक कार्यक्रम में अपनी गायन शैली और भावपूर्ण नृत्य की प्रस्तुति से सबका दिल जीत लिया था.
दिल्ली के पालम स्थित दादा देव ग्राउंड में आयोजित उस कार्यक्रम में भोजपुरी लोकगायन की पारंपरिक व्यास शैली में कुंवर सिंह की वीरगाथा गाकर तीस्ता ने उसी दिन कला जगत में अपनी पहचान बना ली थी.
तीस्ता के उस पहले परफॉर्मेंस के साक्षी रहे देवेंद्र नाथ तिवारी याद करते हुए कहते हैं, "उतनी कम उम्र में उस बच्ची के लय, ताल, आरोह, अवरोह, भाव, मुद्रा और रस की समझ को देखकर सभी हतप्रभ थे. तीन दिनों तक चले उस कार्यक्रम में अनभूति ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन बेहद कुशलता से किया था."
तीस्ता की अधिकांश प्रस्तुति छत्तीसगढ़ की लोकगायिका तीजनबाई की पांडवानी शैली में होती थी. इसमें महिलाएं पुरुषों की कापालिक गायन शैली की तरह भावमय नृत्य के साथ खड़े होकर प्रस्तुति देती है.
बिहार और भोजपुरी के लोकगायन के क्षेत्र में 17 साल की एक लड़की अपनी तरह का अनोखा प्रयोग कर रही थी. इसलिए लोग उसे बिहार की तीजनबाई कहकर पुकारते हैं.
अनुभूति शांडिल्य यानी तीस्ता के उस पहले प्रदर्शन का क़िस्सा सुनाते हुए देवेंद्र नाथ तिवारी कहते हैं, "उस कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री रामबहादुर राय भी थे. तीस्ता की प्रस्तुति देखन के बाद भावविभोर हो उठे. कहने लगे कि भोजपुरी प्रतिभा की खान है. तीस्ता को गाते हुए देखकर ये विश्वास अब और भी पुख्ता हो गया है. उन्होंने तो उसी दिन ही कह दिया था कि यह भोजपुरी संस्कृति की सबसे कम उम्र की संस्कृति दूत है, बड़े मंचों की कलाकार है."

Thursday, August 16, 2018

मुज़फ़्फ़रपुर: ब्रजेश ठाकुर का सच बताने वाली TISS की रिपोर्ट में क्या है?

बिहार सरकार ने शेल्टर होम पर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज ( ) की ऑडिट रिपोर्ट को सार्वजनिक कर दिया है.
14 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने अपनी तरफ़ से क़दम उठाते हुए बिहार सरकार को ऐसा करने का आदेश दिया है.
समाज कल्याण विभाग के प्रधान सचिव अतुल प्रसाद ने बीबीसी को बताया, " की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं करने का मक़सद कुछ छिपाना नहीं था. हमने सुप्रीम कोर्ट से भी तत्काल सार्वजनिक नहीं करने की वजह बता दी है. ऐसा करने पर आरोपी पूरे मामले को कवर-अप करने की कोशिश कर सकते थे."
रिपोर्ट में सुधार गृह की कमियों के साथ-साथ कुछ सुधार गृहों को सराहा भी गया है. लेकिन इस रिपोर्ट में ऐसा क्या था, जिसकी वजह से इसे सार्वजनिक नहीं किया जा रहा
इस साल मार्च में  की एक टीम 'कोशिश' ने बिहार के 35 ज़िलों के 110 ऐसी संस्थाओं की ऑडिट रिपोर्ट बनाई थी. ये सभी संस्थाएं राज्य सरकार में सामाजिक कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत आती हैं.
गौर करने वाली बात यह है कि हर राज्य में सामाजिक कल्याण विभाग गुमशुदा बच्चों, बाल मजदूरों, अनाथ बच्चों, मानसिक रूप से कमज़ोर, घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं के रहने और पुनर्वास के लिए कई तरह की संस्थाएं और कार्यक्रम चलाती है.
इनमें से ज़्यादातर संस्थाएं स्थनीय गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) की देख-रेख में चलती हैं, जिसकी एवज में एनजीओ को सरकार से पैसे मिलते हैं.
ये 110 संस्थाएं ऐसी ही थीं, जो सरकारी मदद से चल रही थीं. इस रिपोर्ट में ऐसी संस्थाओं का ज़िक्र किया गया था, जहां TISS की टीम को इन संस्थाओं में रहने वालों के साथ होने वाली हिंसा (शारीरिक, मानसिक और यौन) के सबूत मिले. मुज़फ़्फ़रपुर उनमें से एक है, लेकिन वह एकमात्र नहीं है.
मुज़फ़्फ़रपुर में तो लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार की बात सामने आई है, लेकिन इस रिपोर्ट में लड़कों के लिए चल रहे ऐसे शेल्टर होम में उनके साथ हो रही हिंसा (शारीरिक, मानसिक और यौन) का भी ज़िक्र किया गया है.
था, बीबीसी ने इसकी पड़ताल की. की इस रिपोर्ट में 14 दूसरे शेल्टर होम का ज़िक्र है, जहां रहने वालों की ज़िंदगी नरक से भी बदतर है.
111 पन्नों की इस रिपोर्ट को पढ़ कर इस बात का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है कि इन बच्चों को एक नरक से निकालकर दूसरे नरक में कैसे झोंक दिया जाता था.
कहीं लड़कियों को महीना आने पर सेनेटरी पैड तक नहीं दिया जाता था, तो कहीं सुरक्षा के नाम पर रखा गया गार्ड ही उनके साथ यौन शोषण करता था, कहीं लोहे के रॉड से पिटाई की जाती थी, तो कहीं जिस बाथरूम में लड़कियां जाती थीं वो अंदर से बंद नहीं किए जा सकते थे, किसी-किसी जगह तो तीन वक़्त का खाना तक नसीब नहीं होता था.
40 डिग्री की गर्मी में जब पंखा, बत्ती न हो, सोने के लिए गद्दा न हो और इन सबके बाद अगर आप अपने भगवान को याद करना चाहें तो उसकी इजाज़त भी न मिले. तो जरा सोचिए वहां रहने वाले पर क्या बीतती होगी.
उनके साथ किस स्तर की शारीरिक, मानसिक और यौन हिंसा चल रही थी इसका अंदाज़ा बच्चों की इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों ने तो यहां तक कह दिया कि बाहर निकल कर हम इनका मर्डर करना चाहते है.
ये रिपोर्ट सरकार की अनदेखी का एक सच्चा सबूत है. कैसे वहां रहने वाले लड़के, लड़कियों, महिलाओं के नाम पर एनजीओ ने करोड़ों कमाए. लेकिन उस कमाई का दस फ़ीसदी भी उन पर खर्च नहीं किया गया.
हालांकि ऐसा भी नहीं है कि सभी सुधार गृहों में यौन हिंसा ही होती थी या तमाम शेल्टर होम नरक का पर्याय बन चुके हैं.
इसी रिपोर्ट में आठ जगहों के सुधार गृह को उनके अच्छे काम के लिए सराहा भी गया है.
आप भी पढ़ें रिपोर्ट का वो हिस्सा जिसमें मुज़फ़्फ़रपुर के आलावा दूसरे सुधार गृहों के बारे में भी लिखा गया है:
1. मोतिहारी में 'निर्देश' संस्था के ज़रिए चलाए जा रहे ऐसे ही एक बॉयेज़ चिल्ड्रेन होम का ज़िक्र रिपोर्ट में किया गया है. वहां पर रह रहे लड़कों ने कोशिश की टीम से उन पर हो रहे शारीरिक हिंसा का ज़िक्र किया है. रिपोर्ट के मुताबिक लड़कों को पाइप से मारा जाता था. किसी भी लड़के की गलती पर वहां रह रहे सभी लड़कों को सज़ा दी जाती थी. जब कोशिश की टीम उस चिल्ड्रेन होम में पहुंची तो वहां केवल एक ही कर्मचारी मौजूद था, जिसे ये भी नहीं पता था कि आखिर उसका काम क्या है.
2. भागलपुर में 'रुपम प्रगति समाज समिति' के बॉयेज़ चिल्ड्रेन होम में रह रहे लड़कों ने कोशिश की टीम से बताया की उन्हें खाना तक नहीं दिया जाता था. ऑडिट पर पहुंची टीम को वहां एक लेटर बॉक्स मिला जिसमें वहां रह रहे लड़कों ने उन पर हो रही शारीरिक हिंसा के ब्यौरा लिखकर डाला था. टीम ने जब उस बक्से को खोलने की चाबी मांगी तो पहले तो उसके गायब होने की बात की गई लेकिन सख़्ती दिखाने पर उस बक्से को खोला गया.
3. मुंगेर में 'पनाह' के बॉयेज़ चिल्ड्रेन होम की कहानी भी दूसरों से मिलती-जुलती थी. वैसे तो इसे एक 'ऑब्जर्वेशन होम' होना चाहिए था. क्योंकि ऑब्जर्वेशन होम में पुनर्वास कार्यक्रम चलाया जाता है, लेकिन यहां लड़कों के पुनर्वास से जुड़ा कोई कार्यक्रम नहीं चलाया जा रहा था.
'ऑब्जर्वेशन होम' और बॉयेज़ चिल्ड्रेन होम में यही सामान्य अंतर होता है. यहां लड़कों को सुपरिटेंडेंट के घर पर खाना बनाने के लिए लगाया जाता था. जो लड़के ऐसा करने से मना करते उन्हें मारा जाता था. सज़ा का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि एक लड़के ने अपने चेहरे पर 3 इंच गहरा घाव दिखाया, जो सज़ा उसे खाना बनाने से इनकार करने के लिए मिली थी.

Monday, August 13, 2018

नज़रिया: प्रधानमंत्री मोदी सवाल-जवाब से कतराते क्यों हैं?

12 अगस्त के 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जो दो पेज लंबा इंटरव्यू छपा है, उसमें वह कौन सी बात है जिसे पढ़ते हुए लगे कि हम कुछ नया पढ़ रहे हैं?
एक तरह से यह पूरा इंटरव्यू पिछले दो-एक वर्षों में अलग-अलग मंचों पर प्रधानमंत्री के भाषणों का संकलन भर है.
इसमें एक भी ऐसा तथ्य नहीं है जिसे प्रधानमंत्री या उनकी सरकार के दूसरे मंत्री पहले जनता के सामने नहीं रख चुके हैं.
निश्चय ही यह अख़बार की नाकामी नहीं है, उस प्रधानमंत्री की भी सीमा है जिसने देश के सार्वजनिक मीडिया के सबसे विश्वसनीय और सबसे बड़ी पहुंच वाले अख़बारों में एक 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' के दो पृष्ठों का इस्तेमाल पाठकों से जीवंत संवाद बनाने की जगह सरकारी किस्म के प्रचार भर में किया.
क्या यह इसलिए हुआ कि यह इंटरव्यू आमने-सामने बैठकर स्वतःस्फूर्त सवाल-जवाब से नहीं, बल्कि ईमेल के ज़रिए हुआ, जिसमें न पलट कर सवाल पूछने की संभावना थी और न ही कोई नया प्रश्न कर सकने की गुंजाइश.
मसलन, जब वे गोरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा की सख़्त आलोचना करते हुए राज्य सरकारों से कड़ी कार्रवाई की अपील कर रहे थे, तब कोई पत्रकार सामने होता तो उनको याद दिला सकता था कि दरअसल, उनकी ही सरकार के मंत्री ऐसी हिंसा के मुज़रिमों को माला पहनाते और दंगाइयों को आश्वस्त करते देखे गए हैं. और ये भी याद दिलाता कि राज्यों में भी उनकी ही पार्टी की सरकारें हैं.
इसी तरह जब वे अपने साहसिक आर्थिक फ़ैसलों का ज़िक्र कर रहे थे और अंसगठित क्षेत्र से 80 प्रतिशत रोज़गार की बात कर रहे थे तो कोई पूछ सकता था कि नोटबंदी जैसे 'साहसिक' फ़ैसले ने क्या सबसे ज़्यादा अंसगठित क्षेत्र के मज़दूरों पर चोट नहीं की?
या फिर इसके वास्तविक परिणाम क्या रहे? या यही कि आज तक रिज़र्व बैंक नोटबंदी में लौटे नोट क्यों नहीं गिन पाया?
ऐसे सवाल और भी हो सकते हैं, लेकिन यह सब तब हो पाता जब इंटरव्यू आमने-सामने बैठकर होता, लेकिन आमने-सामने बैठकर ऐसे इंटरव्यू प्रधानमंत्री ने कब दिए हैं और किनको दिए हैं?
उन गिने-चुने टीवी चैनलों और पत्रकारों को, जिनके बारे में यह राय है कि वे प्रधानमंत्री और सरकार के खुले समर्थक हैं, संभवतः उनका सबसे लंबा लाइव इंटरव्यू इसी साल 18 अप्रैल को लंदन के वेस्टमिन्स्टर सेंट्रल हॉल में प्रसून जोशी ने लिया था, लेकिन तीन घंटे से ऊपर चला यह पूरा इंटरव्यू प्रधानमंत्री की ऐसी प्रशस्ति से भरा था कि इससे प्रसून जोशी की अपनी छवि ख़राब हो गई.
प्रसून जोशी ने उनसे असुविधाजनक प्रश्न पूछना दूर, प्रश्न ही नहीं पूछे, बस तरह-तरह की बालसुलभ जिज्ञासाएं रखीं जिनसे प्रधानमंत्री को अपने मन की बात विस्तार से करने का अवसर मिला.
जो कुछ असुविधानजक इंटरव्यू नरेंद्र मोदी को झेलने प़डे, वे प्रधानमंत्री बनने से पहले झेलने पड़े, लेकिन क्या वे इंटरव्यू उन पत्रकारों के लिए कहीं ज़्यादा असुविधाजनक साबित हुए?
जाने-माने पत्रकार करण थापर इस अंदेशे को सार्वजनिक कर चुके हैं. उनका कहना है कि 2007 के जिस इंटरव्यू को नरेंद्र मोदी बीच में छोड़कर चले गए थे, उसी का नतीजा है कि उनके कार्यक्रमों में बीजेपी के प्रवक्ता नहीं आते, ऐसी मिसालें अनके हैं.रधानमंत्री बनने के बाद ऐसे असुविधानक इंटरव्यू या सवाल-जवाब झेलने की जहमत उन्होंने मोल ली हो, यह याद नहीं आता. बेशक, इस साल के शुरू में ज़ी न्यूज़ के संपादक सुधीर चौधरी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने रोज़गार बढ़ने का दावा करते हुए पकौड़े का हवाला दिया जो अगले कई दिनों तक राजनीतिक-आर्थिक गलियारों में चुटकुले-सा बना रहा.
बाद में प्रधानमंत्री ने रोज़गार गणना के अपने सिद्धांत को लगभग इसी आधार पर विकसित किया और लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस का जवाब देते हुए इसी ढंग से गिनाया कि देश में हर महीने और साल कितना रोज़गार पैदा हो रहा है, टाइम्स ऑफ इंडिया के इंटरव्यू में भी यह बात कही गई है.
इनके अलावा प्रधानमंत्री ने बस देश को संबोधित किया है, देश के सीधे प्रश्नों के जवाब नहीं दिए हैं. सवाल है, प्रधानमंत्री को सीधे संवाद में क्या मुश्किल है? क्या वे असमर्थ हैं?
ऐसी बात कोई नासमझ ही कह सकता है. 13 बरस तक जो आदमी गुजरात का मुख्यमंत्री रहा हो और उसके बाद देश का प्रधानमंत्री बना हो, जिसके अपने नेतृत्व के करिश्मे के बल पर बीजेपी को अकेले बहुमत हासिल हुआ हो, जिसके प्रति भक्तिभाव लोगों में इतना गहरा हो कि वे सारे कष्ट सह कर उसकी बात पर आंख मूंद कर भरोसा करने को तैयार हैं, वह कुछ पत्रकारों के सवालों के जवाब नहीं दे सकता?
वह भी एक ऐसे दौर में, जब पत्रकारिता में ऐसे तेजस्वी और पढ़े-लिखे लोग लगातार कम होते जा रहे हैं जो किसी से भी आंख मिलाकर सवाल पूछ सकें?
जाहिर है, फांस कहीं और है, इस फांस के कम से कम दो स्रोत साफ़ दिखाई पड़ते हैं. एक स्रोत तो संघ परिवार की उस वैचारिकी में है जिस पर उठने वाले कई सवालों के सीधे जवाब नहीं दिए जा सकते.
मसलन, एक राष्ट्र के रूप में भारत की अवधारणा का प्रश्न हो, हिंदुत्व की राजनीति का प्रश्न हो, इतिहास के नायकों का प्रश्न हो, दलितों, अल्पसंख्यकों और स्त्रियों का प्रश्न हो, मंदिर का प्रश्न हो, गोरक्षा का प्रश्न हो, खान-पान और पहनावे से जुड़े प्रश्न हों- इन सब पर जो संवैधानिक स्थिति है, वह संघ परिवार के वैचारिक रुख़ से मेल नहीं खाती- कई बार उसके विरुद्ध जाती है.
मोहन भागवत या दूसरे नेता इस रुख़ का भले बचाव कर लें, लेकिन देश के पीएम की हैसियत से मोदी नहीं कर सकते, शायद यह बात वे समझते हैं और इसलिए ऐसे सवालों के पूछे जाने की किसी भी सीधी संभावना से बचते हैं.
दूसरी बात ये कि आर्थिक मोर्चे और सामाजिक मोर्चे पर बहुत सारी सच्चाइयां ऐसी हैं जिनके सहारे इस सरकार को आईना दिखाया जा सकता है, जिसके सहारे पिछली सरकार को भी आईना दिखाया जाता था.
शायद यह भी एक वजह है कि प्रधानमंत्री सीधे संवाद से बचते हैं. वे 'मन की बात' कह देते हैं, भाषण दे डालते हैं, लेकिन लोगों के मन में उठने वाले सवालों के जवाब देने से कतराते हैं.
काश कि ऐसा न होता, वे जिस चुटीलेपन से अपने भाषण देते हैं, उसी सहजता से पत्रकारों को न्योता देते, उनसे खुली बात करते, कहीं-कहीं अपनी कोशिशों की खामियां भी मान लेते और सुधारने का वादा भी कर देते तो उन वर्गों और ज़मातों को भी जोड़ पाते जो फ़िलहाल उनसे एक दूरी महसूस करने लगे हैं.
ऐसा न करके वे अपना अकेलापन बढ़ा रहे हैं जो फ़िलहाल कहीं से खलने वाली बात नहीं है, क्योंकि उनकी लोकप्रियता का सितारा बुलंदी पर है, लेकिन ऊपर जाती गेंद जब अपनी ऊर्जा और उससे मिलने वाली हवा का बल खो बैठती है तो किस तेज़ी से नीचे गिरती है- यह उनको ही नहीं, सबको याद रखना चाहिए.

Monday, July 30, 2018

इंडोनेशिया में भूकंप से तबाही, 13 लोगों की मौत

इंडोनेशिया में एक शक्तिशाली भूकंप के कारण कम के कम 13 लोगों के मारे जाने की ख़बर है.भूकंप की तीव्रता 6.4 मापी गई है. ये भूकंप रविवार को स्थानीय समय अनुसार सुबह 7 बजे आया.इसका केंद्र उत्तरी लॉमबोक में बताया गया है. लॉमबोक एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है जो इंडोनेशिया के बाली द्वीप से 40 किलोमीटर पूर्व में स्थित है.

सरकारी अधिकारियों के अनुसार, भूकंप से कई इमारतों को नुकसान पहुँचा है और दर्जनों लोग घायल हैं.
इंडोनेशिया में आपदा प्रबंधन करने वाली एजेंसी के प्रवक्ता सुतोपो पुरवो नुगरोहो ने बताया है, "क़रीब 40 लोग घायल हुए हैं. दर्जनों मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं. हमें लगता है कि घायलों और मृतकों की संख्या अभी बढ़ सकती है. हमने अभी आंकड़े जुटाना शुरू नहीं किया है."

एक चश्मदीद ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया, "बहुत तेज़ भूकंप था. सब कुछ हिल गया. लोग घबराए हुए इधर-उधर भाग रहे थे. भूकंप आने के कुछ ही मिनटों में पूरे शहर की बिजली चली गई थी."
इंडोनेशिया में भूकंप का ज़्यादा ख़तरा रहता है क्योंकि ये देश 'रिंग ऑफ़ फ़ायर' यानी लगातार भूकंप और ज्वालामुखीय विस्फोटों की रेखा पर स्थित है. ये रेखा प्रशांत महासागर के लगभग पूरे हिस्से को घेरती है.

एक चश्मदीद ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया, "बहुत तेज़ भूकंप था. सब कुछ हिल गया. लोग घबराए हुए इधर-उधर भाग रहे थे. भूकंप आने के कुछ ही मिनटों में पूरे शहर की बिजली चली गई थी."इंडोनेशिया में भूकंप का ज़्यादा ख़तरा रहता है क्योंकि ये देश 'रिंग ऑफ़ फ़ायर' यानी लगातार भूकंप और ज्वालामुखीय विस्फोटों की रेखा पर स्थित है. ये रेखा प्रशांत महासागर के लगभग पूरे हिस्से को घेरती है.

दुनिया के आधे से ज़्यादा सक्रिय ज्वालामुखी इसी रिंग ऑफ़ फ़ायर का हिस्सा हैं.साल 2016 में सुमात्रा द्वीप के उत्तर-पूर्वी तट पर भी एक भूकंप आया था जिसकी तीव्रता 6.5 थी. इसमें दर्जनों लोगों की मौत हो गई थी और 40,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए थे.

सरकारी अधिकारियों के अनुसार, भूकंप से कई इमारतों को नुकसान पहुँचा है और दर्जनों लोग घायल हैं.
इंडोनेशिया में आपदा प्रबंधन करने वाली एजेंसी के प्रवक्ता सुतोपो पुरवो नुगरोहो ने बताया है, "क़रीब 40 लोग घायल हुए हैं. दर्जनों मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं. हमें लगता है कि घायलों और मृतकों की संख्या अभी बढ़ सकती है. हमने अभी आंकड़े जुटाना शुरू नहीं किया है."

एक चश्मदीद ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया, "बहुत तेज़ भूकंप था. सब कुछ हिल गया. लोग घबराए हुए इधर-उधर भाग रहे थे. भूकंप आने के कुछ ही मिनटों में पूरे शहर की बिजली चली गई थी."
इंडोनेशिया में भूकंप का ज़्यादा ख़तरा रहता है क्योंकि ये देश 'रिंग ऑफ़ फ़ायर' यानी लगातार भूकंप और ज्वालामुखीय विस्फोटों की रेखा पर स्थित है. ये रेखा प्रशांत महासागर के लगभग पूरे हिस्से को घेरती है.