जुलाई, 2018 को नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का फ़ाइनल ड्राफ़्ट जारी हुआ है.
असम के 40 लाख लोगों के नाम इस लिस्ट में शामिल नहीं हैं, इनमें हिंदू-मुसलमान, बंगाली-बिहारी सभी हैं.
अजित दास के मामले की वजह है उनके माता-पिता का 1960 के दशक में बांग्लादेश से भारत आकर बस जाना.
वैसे, उनकी तरह आए तमाम लोगों के पास अगर नागरिकता के प्रमाण हैं तो उनका नाम एनआरसी में या तो आ चुका है या आगे लिस्ट में आने की संभावना है.
हालांकि अजित दास का कहना है कि उनका जन्म वगैरह भारत में हुआ है और सभी प्रमाण मौजूद हैं, लेकिन पिछली बार सभी दस्तावेज़ नामंज़ूर भी कर दिए गए थे.
ज़ाहिर है, जिन लाखों लोगों के नाम एनआरसी में नहीं आए हैं उनके भीतर इस बात को लेकर डर ज़रूर है कि आगे क्या होगा.
सरकार ने इस बात का भरोसा दिलाया है कि किसी के ख़िलाफ़ फ़िलहाल कोई क़दम नहीं उठाया जाएगा.
सभी को सितंबर के अंत तक दोबारा दस्तावेज़ जमा करने का मौक़ा भी दिया गया है.
जिन दस्तावेज़ों को जमा करना है, उनमें से किसी एक से ये प्रमाणित होना ज़रूरी है कि जमा करने वाले या उनके पूर्वजों का नाम 1951 के एनआरसी में या 24 मार्च 1971 तक के किसी वोटर लिस्ट में मौजूद था.
इस बीच असम के इस छोटे से गांव में जुतिका और अजित दास के बच्चे इन दिनों इस बात से ही खुश हैं कि पापा घर वापस लौट आए हैं.
जुतिका के मुताबिक़, "महीनों पिता को न देखने की वजह से बच्चे अब उन्हें घर से सटी हुई दुकान तक में नहीं जाने देते. ये सोच के मन डर भी जाता है कि लाखों ऐसे परिवार असम में मौजूद हैं जिनके ऊपर इस तरह की तलवार लटक रही है. बस एक ही ख़ुशी है कि पति ज़मानत पर क़ैद से छूट गए."
ये ख़ुशी कब तक की है, इसका पता किसी को नहीं.
पिछले साल 10 जुलाई को अनुभूति शांडिल्य 'तीस्ता' ने अपने फ़ेसबुक पेज पर सावन को समर्पित ये लाइनें लिखी थीं. कमेंट बॉक्स में संजय कुमार पांडेय नाम के एक शख़्स के पूछने पर कि इस गीत का ऑडियो वर्जन कब आएगा, तीस्ता ने जवाब दिया था कि जल्दी ही निकलने वाला है.
अब तो इस साल का सावन भी बीत गया, लेकिन इस गीत का ऑडियो कहां है? पता कैसे चलेगा? फ़ेसबुक स्क्रॉल करते-करते नज़र तीस्ता के भाई उद्भव शांडिल्य की एक पोस्ट पर गई. इस साल के सावन के बीत जाने के अगले दिन यानी 27 अगस्त को उद्भव फ़ेसबुक पर लिखते हैं-
"लौट आओ मेरी अपराजिता"
भैया तुमसे साहित्य पढ़ने आया है और तुम्हारे लिए ब्रिटैनिया का केक भी लाया है.
27 अगस्त की शाम उद्भव शांडिल्य पटना एम्स में भर्ती अपनी बहन तीस्ता को देखने गए थे. तब तक डॉक्टरों ने कह दिया था शरीर के सारे ऑर्गन फेल हो चुके हैं. केस अब हाथ के बाहर है. फिर भी भाई उद्भव को न जाने क्यों लग रहा था कि बहन जिसको वह "अपराजिता" कहा करता था, लौट कर आएगी.
पिता उदय नारायण सिंह ने फ़ेसबुक पर 28 अगस्त की शाम एक पोस्ट लिखी था. उन्होंने लिखा कि "तीस्ता ना रहली (तीस्ता नहीं रही)".
उनके इतना कहने के बाद से ही सोशल मीडिया पर लोग तीस्ता को श्रद्धांजलि देने लगे हैं. बिहार और भोजपुर के कला जगत से जुड़े लोग तीस्ता के जाने को लोकागाथा गायन की संस्कृति के लिए एक अपूरणीय क्षति बता रहे हैं.
तीस्ता का असल नाम अनुभूति शांडिल्य है. उम्र महज 17 साल. इसी साल बिहार बोर्ड से 12वीं की परीक्षा पास की थीं. फ़ेसबुक से जो कुछ पता चल पाया उसके अनुसार "तीस्ता" लोकगाथा गायन की पारंपरिक व्यास शैली का पालन करते हुए कुंवर सिंह की वीरगाथा गाती थीं.
देवेंद्र आगे कहते हैं, "ऐसा लग ही नहीं रहा था कि वो उसकी पहली प्रस्तुति थी. मुझे याद है कि वहां मौजूद कला समीक्षक डॉ धीरेंद्र मिश्रा ने मंच से यह कहा था कि अनुभूति के रूप में भोजपुरी को "तीजनबाई" मिली है. क्योंकि वह न सिर्फ़ अपनी खनकती आवाज़ में गा रही थी, बल्कि भावमय नृत्य से सीधे श्रोताओं और दर्शकों के दिलों में उतर भी रही थी.''
बिहार में छपरा ज़िले के रिविलगंज की रहने वाली तीस्ता के पिता उदय नारायण सिंह ख़ुद भी संगीत के शिक्षक हैं. कई कार्यक्रमों में आयोजित तीस्ता की प्रस्तुतियों में मंच पर वो भी अपनी बेटी के साथ नज़र आते थे.
महज 13 साल की उम्र में तीस्ता ने पहली बार मैथिली-भोजपुरी अकादमी की तरफ़ से आयोजित एक कार्यक्रम में अपनी गायन शैली और भावपूर्ण नृत्य की प्रस्तुति से सबका दिल जीत लिया था.
दिल्ली के पालम स्थित दादा देव ग्राउंड में आयोजित उस कार्यक्रम में भोजपुरी लोकगायन की पारंपरिक व्यास शैली में कुंवर सिंह की वीरगाथा गाकर तीस्ता ने उसी दिन कला जगत में अपनी पहचान बना ली थी.
तीस्ता के उस पहले परफॉर्मेंस के साक्षी रहे देवेंद्र नाथ तिवारी याद करते हुए कहते हैं, "उतनी कम उम्र में उस बच्ची के लय, ताल, आरोह, अवरोह, भाव, मुद्रा और रस की समझ को देखकर सभी हतप्रभ थे. तीन दिनों तक चले उस कार्यक्रम में अनभूति ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन बेहद कुशलता से किया था."
तीस्ता की अधिकांश प्रस्तुति छत्तीसगढ़ की लोकगायिका तीजनबाई की पांडवानी शैली में होती थी. इसमें महिलाएं पुरुषों की कापालिक गायन शैली की तरह भावमय नृत्य के साथ खड़े होकर प्रस्तुति देती है.
बिहार और भोजपुरी के लोकगायन के क्षेत्र में 17 साल की एक लड़की अपनी तरह का अनोखा प्रयोग कर रही थी. इसलिए लोग उसे बिहार की तीजनबाई कहकर पुकारते हैं.
अनुभूति शांडिल्य यानी तीस्ता के उस पहले प्रदर्शन का क़िस्सा सुनाते हुए देवेंद्र नाथ तिवारी कहते हैं, "उस कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री रामबहादुर राय भी थे. तीस्ता की प्रस्तुति देखन के बाद भावविभोर हो उठे. कहने लगे कि भोजपुरी प्रतिभा की खान है. तीस्ता को गाते हुए देखकर ये विश्वास अब और भी पुख्ता हो गया है. उन्होंने तो उसी दिन ही कह दिया था कि यह भोजपुरी संस्कृति की सबसे कम उम्र की संस्कृति दूत है, बड़े मंचों की कलाकार है."
असम के 40 लाख लोगों के नाम इस लिस्ट में शामिल नहीं हैं, इनमें हिंदू-मुसलमान, बंगाली-बिहारी सभी हैं.
अजित दास के मामले की वजह है उनके माता-पिता का 1960 के दशक में बांग्लादेश से भारत आकर बस जाना.
वैसे, उनकी तरह आए तमाम लोगों के पास अगर नागरिकता के प्रमाण हैं तो उनका नाम एनआरसी में या तो आ चुका है या आगे लिस्ट में आने की संभावना है.
हालांकि अजित दास का कहना है कि उनका जन्म वगैरह भारत में हुआ है और सभी प्रमाण मौजूद हैं, लेकिन पिछली बार सभी दस्तावेज़ नामंज़ूर भी कर दिए गए थे.
ज़ाहिर है, जिन लाखों लोगों के नाम एनआरसी में नहीं आए हैं उनके भीतर इस बात को लेकर डर ज़रूर है कि आगे क्या होगा.
सरकार ने इस बात का भरोसा दिलाया है कि किसी के ख़िलाफ़ फ़िलहाल कोई क़दम नहीं उठाया जाएगा.
सभी को सितंबर के अंत तक दोबारा दस्तावेज़ जमा करने का मौक़ा भी दिया गया है.
जिन दस्तावेज़ों को जमा करना है, उनमें से किसी एक से ये प्रमाणित होना ज़रूरी है कि जमा करने वाले या उनके पूर्वजों का नाम 1951 के एनआरसी में या 24 मार्च 1971 तक के किसी वोटर लिस्ट में मौजूद था.
इस बीच असम के इस छोटे से गांव में जुतिका और अजित दास के बच्चे इन दिनों इस बात से ही खुश हैं कि पापा घर वापस लौट आए हैं.
जुतिका के मुताबिक़, "महीनों पिता को न देखने की वजह से बच्चे अब उन्हें घर से सटी हुई दुकान तक में नहीं जाने देते. ये सोच के मन डर भी जाता है कि लाखों ऐसे परिवार असम में मौजूद हैं जिनके ऊपर इस तरह की तलवार लटक रही है. बस एक ही ख़ुशी है कि पति ज़मानत पर क़ैद से छूट गए."
ये ख़ुशी कब तक की है, इसका पता किसी को नहीं.
पिछले साल 10 जुलाई को अनुभूति शांडिल्य 'तीस्ता' ने अपने फ़ेसबुक पेज पर सावन को समर्पित ये लाइनें लिखी थीं. कमेंट बॉक्स में संजय कुमार पांडेय नाम के एक शख़्स के पूछने पर कि इस गीत का ऑडियो वर्जन कब आएगा, तीस्ता ने जवाब दिया था कि जल्दी ही निकलने वाला है.
अब तो इस साल का सावन भी बीत गया, लेकिन इस गीत का ऑडियो कहां है? पता कैसे चलेगा? फ़ेसबुक स्क्रॉल करते-करते नज़र तीस्ता के भाई उद्भव शांडिल्य की एक पोस्ट पर गई. इस साल के सावन के बीत जाने के अगले दिन यानी 27 अगस्त को उद्भव फ़ेसबुक पर लिखते हैं-
"लौट आओ मेरी अपराजिता"
भैया तुमसे साहित्य पढ़ने आया है और तुम्हारे लिए ब्रिटैनिया का केक भी लाया है.
27 अगस्त की शाम उद्भव शांडिल्य पटना एम्स में भर्ती अपनी बहन तीस्ता को देखने गए थे. तब तक डॉक्टरों ने कह दिया था शरीर के सारे ऑर्गन फेल हो चुके हैं. केस अब हाथ के बाहर है. फिर भी भाई उद्भव को न जाने क्यों लग रहा था कि बहन जिसको वह "अपराजिता" कहा करता था, लौट कर आएगी.
पिता उदय नारायण सिंह ने फ़ेसबुक पर 28 अगस्त की शाम एक पोस्ट लिखी था. उन्होंने लिखा कि "तीस्ता ना रहली (तीस्ता नहीं रही)".
उनके इतना कहने के बाद से ही सोशल मीडिया पर लोग तीस्ता को श्रद्धांजलि देने लगे हैं. बिहार और भोजपुर के कला जगत से जुड़े लोग तीस्ता के जाने को लोकागाथा गायन की संस्कृति के लिए एक अपूरणीय क्षति बता रहे हैं.
तीस्ता का असल नाम अनुभूति शांडिल्य है. उम्र महज 17 साल. इसी साल बिहार बोर्ड से 12वीं की परीक्षा पास की थीं. फ़ेसबुक से जो कुछ पता चल पाया उसके अनुसार "तीस्ता" लोकगाथा गायन की पारंपरिक व्यास शैली का पालन करते हुए कुंवर सिंह की वीरगाथा गाती थीं.
देवेंद्र आगे कहते हैं, "ऐसा लग ही नहीं रहा था कि वो उसकी पहली प्रस्तुति थी. मुझे याद है कि वहां मौजूद कला समीक्षक डॉ धीरेंद्र मिश्रा ने मंच से यह कहा था कि अनुभूति के रूप में भोजपुरी को "तीजनबाई" मिली है. क्योंकि वह न सिर्फ़ अपनी खनकती आवाज़ में गा रही थी, बल्कि भावमय नृत्य से सीधे श्रोताओं और दर्शकों के दिलों में उतर भी रही थी.''
बिहार में छपरा ज़िले के रिविलगंज की रहने वाली तीस्ता के पिता उदय नारायण सिंह ख़ुद भी संगीत के शिक्षक हैं. कई कार्यक्रमों में आयोजित तीस्ता की प्रस्तुतियों में मंच पर वो भी अपनी बेटी के साथ नज़र आते थे.
महज 13 साल की उम्र में तीस्ता ने पहली बार मैथिली-भोजपुरी अकादमी की तरफ़ से आयोजित एक कार्यक्रम में अपनी गायन शैली और भावपूर्ण नृत्य की प्रस्तुति से सबका दिल जीत लिया था.
दिल्ली के पालम स्थित दादा देव ग्राउंड में आयोजित उस कार्यक्रम में भोजपुरी लोकगायन की पारंपरिक व्यास शैली में कुंवर सिंह की वीरगाथा गाकर तीस्ता ने उसी दिन कला जगत में अपनी पहचान बना ली थी.
तीस्ता के उस पहले परफॉर्मेंस के साक्षी रहे देवेंद्र नाथ तिवारी याद करते हुए कहते हैं, "उतनी कम उम्र में उस बच्ची के लय, ताल, आरोह, अवरोह, भाव, मुद्रा और रस की समझ को देखकर सभी हतप्रभ थे. तीन दिनों तक चले उस कार्यक्रम में अनभूति ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन बेहद कुशलता से किया था."
तीस्ता की अधिकांश प्रस्तुति छत्तीसगढ़ की लोकगायिका तीजनबाई की पांडवानी शैली में होती थी. इसमें महिलाएं पुरुषों की कापालिक गायन शैली की तरह भावमय नृत्य के साथ खड़े होकर प्रस्तुति देती है.
बिहार और भोजपुरी के लोकगायन के क्षेत्र में 17 साल की एक लड़की अपनी तरह का अनोखा प्रयोग कर रही थी. इसलिए लोग उसे बिहार की तीजनबाई कहकर पुकारते हैं.
अनुभूति शांडिल्य यानी तीस्ता के उस पहले प्रदर्शन का क़िस्सा सुनाते हुए देवेंद्र नाथ तिवारी कहते हैं, "उस कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री रामबहादुर राय भी थे. तीस्ता की प्रस्तुति देखन के बाद भावविभोर हो उठे. कहने लगे कि भोजपुरी प्रतिभा की खान है. तीस्ता को गाते हुए देखकर ये विश्वास अब और भी पुख्ता हो गया है. उन्होंने तो उसी दिन ही कह दिया था कि यह भोजपुरी संस्कृति की सबसे कम उम्र की संस्कृति दूत है, बड़े मंचों की कलाकार है."
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